वह लम्हें बित गए जो आज भी याद हैं
वो बचपन था हमारा कैसे भूल जाएं वो
कभी शरारतें कभी दौड़ना भागना
कैसे भूल जाएं वो
कभी पिता के कंधों पे होकर सवार
वो मेले में घूमना
कभी मां की गोद में सुकून से सो जाना
कैसे भूल जाएं वो
वो जिद्द करना वो पापा का डांटना
फिर मां का हमें मना लेना
कैसे भूल जाएं वो
कभी पेड़ों पे चढना कभी यारों संघ
मस्ती करना
वो दिन बडे़ बेपरवाह और मौज मस्ती भरे थे
कैसे भूल जाएं वो
वह लम्हें आज भी याद आतें हैं
बहोत


