हुकूमत फरमाइए जान हाज़िर है

आशिकाना आलम है

तन्हाईयों से क्या मिलना है

कब तक रहोगे खामोश रूठे हमसे

खता इतनी भी कोई बड़ी नहीं

बस देर हुई है आने में

इसमें भी मेरी कोई खता नहीं

तेरे ही तस्व्वुर में था मैं बैठा

वक़्त का पता चला ही नहीं

अब मान भी जाओ फिर ऐसा ना

होगा कभी

कहो तो लहू से अपने लिख के दे दें

दिल की किताब पे

तेरे सिवा कोई और ना होगा

मेरे तस्व्वुर में कभी

तू मेरा जहाँ तू ही मेरी दुनियाँ

तेरे बिन मेरा कोई वजूद कहाँ