कुछ यूँ था वो आलम कुछ यूँ बदल

गया वो मौसम

जब पल्लू उसने अपने सर से हटाया

जुल्फों को खुला छोड़ हवाओं में लहराया

एक काली घटा सी घिर आई थी

तपती धुप में ठंडी छांव खिल आई थी

बरखा हो गई उस दिन बिन मौसम

जब वो मुस्कुराई थी

मानों कयामत ही हो गई

जब वो शर्माई थी

उसके नज़रों का वार

फिर यूँ चला की

मदहोश सारा आलम हो गया

वहाँ ऐसा कौन ना था जीसे

इश़्क ना हो गया

हर शख्स अपना दिल उनके

कदमों में धर गया

उसके लिए मानों खुद से ही

बगावत कर गया

वो पल वो लम्हा आज भी याद है

हमें

आखिर मैं भी तो उनके इश़्क का

बिमार हुआ था

रोग ये लाईलाज मुझे भी

हुआ था