माना की नहीं पास मेरे कुछ भी गरीब हूँ मैं
मगर अमीरों से भी अमीर हूँ मैं
माना की ना बिस्तर है पास मेरे मखमली
ना घर है रहने को महलों सा
मगर माँ के आंचल से लिपट
उसकी गोद में सोने का जो सुकून है
वो जन्नत में भी ना हांसिल होगा किसी को
उसके पैरों को छूके लगे ऐसा
जैसे चारो धाम हैं यहीं
फिर हम मंदिर मंदिर क्यों ढूंढ भगवान किसी पत्थर में
जब माँ के चरणों में ही धाम हैं सारे


