वो रात गई वो लम्हा गया
मगर आंसू रूकते नहीं
वो साथ छूटा विश्वास टूटा
मगर यकीन खत्म होता नहीं
तेरे वादे पे एतबार अब रहा नहीं
फिर भी तेरे दिदार बिन
मैं चैन से कभी रह पाया नहीं
वो लम्हा याद रहता है
वो यादों में आकर दर्द दे जाता है
कभी खामोश हो जाता है
कभी तन्हा हमें कर जाता है
जाने कैसी ये मोहब्बत है
कमबख्त जान ही ले जाता है
मर कर भी जींदा रहना चाहते हैं
कभी यादों में उनकी
कभी ख्यालों में
क्या यही है मोहब्बत
जो मरने भी नहीं देती चैन से


