कुछ दर्द है कुछ खलिश है
मगर ठीक है
जींदा हूँ यही बहोत है
ना आरजू है ना कोई उम्मीद है
खुद से मेरी एक अलग ही जंग है
कभी खामोश तो कभी तन्हा हूँ मैं
हाँ थोड़ा नादान थोड़ा अलहड़ हूँ मैं
कभी खुद के लिए कभी बस खुद के ही लिए
जी रहा हूँ मैं
क्योंकि खुद को खुद से ज़्यादा अहमियत दे रहा हूँ मैं
सोचता हूँ रूखसत ले लूं इस जहाँ से
मगर खुद को तैयार कर नहीं पा रहा हूँ मैं
सायद खुद को खुद की अभी है ज़रूरत
मुझे मुझसे ज़्यादा
तभी तो हर रोज मर रहा हूँ
मगर जी रहा हूँ मैं
खामोश हूँ तन्हा हूँ मैं


