कभी पास थे आज दूर हैं

माना मजबूर हैं

यादों में भी धुंध है छाई

ख्वाबों में भी नमी हैं आई

फासले हो रहें हैं और दरमियाँ हमारे

तुम वहाँ हम यहाँ जाने कैसी है ये वेदना

कभी साथ थे कभी पास थे वो लम्हें भी

बड़े यादगार थे

आज दूर हैं मजबूर हैं ये लम्हें भी

चलो मंजूर हैं

बस एक बार हो जाए दीदार उनका

फिर चाहे सांसें भी ये थम जाए

मगर रूखसत लेते लेते इस जहाँ से

उनका चेहरा तो निगाहों में अपने

बसा लें

फिर चाहे दफन कर देना मुझे इस माटी में

मैं भी मिट्टी हो जाऊंगा

फिर भी उनसे मिलने को

हवाओं में मिल कर उनके दहलीज की

मिट्टी बन रह जाउंगा