दीदार को तेरे तरसे ये अखियाँ

जाने किस जहाँ में है तूं

तेरी एक झलक को तरसे हम

एक लम्हा जैसे जाने कितनी सदियाँ

लब पे मेरे बस नाम तेरा

फिर भी खामोश ये जुबां और नम हैं अखियां

कहीं बदनाम ना हो जाए तू यही सोच कर

रहते है खामोश

तेरी यादों के साये में दिन रात काटते हैं

जैसे काटों कि सेज कोई