तलाश निगाहों की खत्म कहाँ हुई है अभी

अभी तो ढूंढ रहीं हैं ये आंखें ज़रिया दर्द का

कोई

मिल जाए जो दर्द का पता तो पुछना है

हम तो मुक्मल पहले भी ना थे

आज भी ना हैं

फिर क्यों ये तौफा दर्द भरा हमें मिला है

हमने तो दर्द को ही यार बनाया था अपना

और यार ने दी दर्द बनकर

दर्द दिया है

मेरे अलफ़ाज़ मेरे हि विरूद्ध हो जाएंगे

ये मालूम ना था

ज़रा सा दर्द से हुआ राबता और

अलफ़ाजों को बिखरा छोड़ जाएंगे

मेरी मुस्कान ने सदा मुझे खुद में सामिल रखा है

दर्द को मुझ तक ही रखा है

लबों पे झूठी हंसी और दिल में दर्द छुपाया है

हमने आंखों पे भी पहरा बिठाया है

कहीं देख ना ले कोई दर्द मेरा मेरी आंखों में

तभी तो आंसुओं को भी शख्त हिदायत दे रखा है

कि छोड़ घर आंखों का वो जाए ना कहीं

ताकि दर्द मेरा आंसुओं संघ बिखर जाए ना कहीं