रातों के अंधेरे चीखतें हैं

दोपहर के सन्नांटो में

जब कोई बेटी निकलती है

इन विरान सुनसान सड़कों पे

नजरें गड़ाए गिद्ध इंसानी रूप में नजर

आतें हैं

वो पल्लू अपना जब सम्भालती है

नजरों से ही जैसे नोच खाएंगे

हैवानों से वो लगतें हैं

एक बेटी जब घर से निकलती है

जाने कितने नजरों मे चुभती है