फरिश्ता मौत का लेने आया मुझे
कहता है साथ चलने को
जी लिया है बहोत मैंने
सुनता नहीं एक बात मेरी
बोलने की इजाज़त मुझे देता नहीं
मेरे आंसुओं को देख मंद मंद मुस्काता है
मेरे ख्वाबों पे मौत की स्याह स्याही फेर
ख्वाबों को बदरंग काला कर जाता है
मेरे सपनों के महल पे
अपने अहंकार से हमला कर उसे ढाह जाता है
मैं देखता रहता हूँ नम भीगी आँखों से
मेरी आँखों से गिरते अश़्को से वो
प्यास अपनी जाने कैसे बुझा जाता है
वो फरिश्ता मौत का कोई और नहीं
खुद मेरा ही अतीत है
जो आज हिसाब आया है लेने
मेरे कर्मों का
मैं मुंह छुपाऊँ भी तो कहाँ और कैसे इससे
वो मेरे चेहरे पे लगे
हर मुखौटे से वाकिफ है
वो मेरे अतीत की परछाईं है
जो मेरे रग रग से वाकिफ है
मेरी मौत तय लगती है
सायद ज़िंदगी इतनी ही लिखी है
या मेरी ही कोई गलती है
