इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मिडिया के इस दौर में साहित्य के प्रति एक अलख जगी है और लाखों की तादाद में नौजवान युवक -युवतियां साहित्य से जुड़े हैं ! एक ज़माना था जब साहित्य की तरफ रुझान एक खास किस्म के लोगों को ही होता था मगर फेसबुक, ट्वीटर और इन्स्टा के काल में जिसे देखो वो एक दूसरे से प्रभावित हो या एक दूसरे की पीठ खुजा कर काव्य गंगा में डूबकी लगा रहा है ! काव्य गंगा में डूबकी लगाना कत्तई वर्जित नहीं है पर इसके लिए धेर्य इस पीढ़ी में कम है जिस तरह से नमाज़ बेवजू नहीं पढ़ी जाती उसी तरह रचना रचने से पहले स्वयम को तैयार करना होता है ! एक दिन में ही ग़ालिब ओ मीर ,मीरा कबीर , दिनकर परवीन शाकिर बनने की हवस नस्ले नौ के साथ साथ कुछ अधेड़ उम्र के लिखने वालों में भी बढ़ती जा रही है !
सोशल मिडिया पर कुछ शातिर किस्म के गुरु भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं जो बा-आसानी ताड़ लेते हैं कि फलां मेरे जाल में आ जायेगी और इसी प्लेटफॉर्म पर शोहरत के चस्के में चिडिया भी खुद जाल में घुसने के लिए लालायित रहती हैं ! ये गुरु घंटाल नव-युवतियों और अधेड़ उम्र की लेखिकाओं को व्हाट्सअप, फेसबुक या फोन पर खास तरह के नुस्खे बताते हैं कि किस तरह ज़माने से अलग लिखना है !
इसी प्रक्रिया के चलते इन गुरु-घंटालों ने अपने अपने ख़ास समूह या ये कहूँ कि साहित्यिक गिरोह बना लिए हैं और अब तो इन गुरुओं के ज्ञान से कुछ चेलियाँ स्वयम सिद्ध साध्वी नुमा स्वयम्भू
महा- कवयित्रियाँ बन चुकी हैं ! इन साध्वी किस्म की लेखिकाओं का सोशियल मिडिया पर अपना साम्राज्य है , 16 बरस के नौजवान से लेकर 70 तक के ह्रदय से युवा भी इनकी चापलूसी और वाह-वाही करते नहीं थकते हैं ! इन तथाकथित लेखिकाओं के लेखन का मेयार इनकी पोस्ट पर आये लाइक तय करते हैं ,ट्वीटर जैसे धरातल पर इन स्वयम्भू महादेवी वर्माओं के हज़ारों की संख्या में फॉलोवर्स हैं और ये लेखिकाएं अब अपने-अपने मठ सोशियल मिडिया पर स्थापित कर चुकी हैं !
ऐसा नहीं है कि इस तरह के किरदार लेखकों / कवियों के नहीं है परन्तु इन्हें इनके महिला न होने का नुक्सान तो होता ही है !
ट्वीटर और फेसबुक पर पिछले दो – तीन वर्षों में कुछ साहित्यिक पोर्टल्स की भी बाढ़ आ गयी है ,अधिकतर ये साहित्यिक पोर्टल या हैंडल इन्ही साहित्यिक गिरोहों के है जो इन्हें सुबह से शाम तक प्रमोट करने में लगे रहते है ! कुछ साध्वी किस्म की लेखिकाएं स्वयम भी छदम आईडी से इस तरह के पोर्टल चलाती हैं और अपने इश्तेहार का पोस्टर खुद अपनी दीवार पे लगाती है :--
*इश्तिहार भी हम हुए , और हमी दीवार
तब जाकर चलने लगा, अपना कारोबार*
पिछले दिनों ट्वीटर के एक साहित्यिक पोर्टल पर कुछ पंक्तियाँ पढी ,रचना के नीचे कवयित्री का नाम लिखा था , खैर मेरा उन से ज़ाती तौर पर कोई मन मुटाव आदि भी नहीं था पर नज़र के सामने कोई रचना आ जाए तो पढ़ ही ली जाती है अच्छी लगती है तो निश्चित तौर पर दाद देता हूँ और समझ ना आये तो सवाल भी करता हूँ हो सकता है कि लिखने वाले का कोई और पहलू रहा हो ! लेखिका से उस पोर्टल के मार्फ़त सवाल किया गया कि इन पंक्तियों का न तो कोई आपस में राब्ता है और न ही कोई अर्थ समझ आ रहा है ! आदरणीया ने ये प्रश्न पढ़ा और सबसे पहले सवाल करने वाले को ब्लॉक कर दिया ताकि मुस्तक़बिल में ये आदमी सवाल ही ना कर सके ! अगर साहित्य के प्रति आप गंभीर हैं , आप किसी रचना को पोस्ट कर रहे हैं तो क्या आपका नैतिक दायित्व नहीं बनता कि आप पाठक के प्रश्न का उत्तर दें परन्तु यहाँ तो बिना सर पैर की रचनाये इस लिए पोस्ट की जाती है कि पोस्ट करते ही ठरकी बिरादरी ,महिलालू किस्म की प्रजाति वाह वाह करने टूट पड़ेगी और लेखिका महान से महानतम आयाम पर पहुँच जायेगी ! मुझे जिज्ञासा हुई कि ऐसी पंक्तियाँ जिन का काव्य से दूर दूर तक कोई नाता नहीं उन्हें इतने लाइक कैसे मिल सकते है ? इसमें कोई रहस्य अवश्य है और मैंने लेखिका की कुछ और रचनाएं इधर उधर पढी , आधे घंटे की मशक्कत के बाद सब कुछ साफ़ साफ़ नज़र आने लगा ! दरअसल सारा खेल कंटेंट / विचार और शब्दों का है, आदरणीया विलायती साहित्यकारों को खूब पढ़ती हैं और ये अच्छी बात है ! मुख्तलिफ मुख्तलिफ भाषाओं का साहित्य पढ़ना भी चाहिए पर वहाँ से हू ब हू माल उठाकर उसे हिंदी के गूढ़ शब्दों से अपने नाम से चस्पा कर देना कौनसी महानता है ? प्रमाण के साथ अँगरेज़ कवि की कविता और उन कवयित्री की तथाकथित रचना जब मैंने ट्वीटर पर लगाईं तो उनके बहुत से मुरीद सच्चाई से वाकिफ हुए पर गिरोह के लोग मुझ पर टूट पड़े ,उन लेखिका जी ने छदम नाम की id बनाकर बहुत निम्नस्तरीय भाषा में मुझे भला बुरा कहा , मुझे मानसिक रोगी और तनक़ीद करने वाले कुछ पाठकों को कुंठित तक कहा गया ।उनके गिरोह की कई महिला सदस्य भी तीर ओ तबर लेकर दीदी के पक्ष में युद्ध लड़ने आ गयी ! मुझे एक बात समझ नहीं आती ये स्वयम्भू प्रजाति के लेखक / लेखिकाएं दर्पण देखने से इतना घबराते क्यों है ? क्यों नहीं सेहतमंद चर्चा का सम्मान करते , आत्म मुग्धता को सिवाय प्रसंशा के कुछ भी गवारा नहीं है क्या ?
*सूरज पर तनक़ीद करे है
जुगनू तेरी इतनी हिम्मत*
लेखिका ट्वीटर पर इसके बाद लिखती है कि मैं स्वतंत्र हूँ जो मन में आएगा लिखूंगी , जी बेशक आप स्वतंत्र हैं परन्तु आप बुद्ध से पोछा लगवा रही हैं , ईश्वर को अफीमची बाप लिख रही हैं , आप माँ बनने की प्रक्रिया को देह का कौशल लिख रही हैं , आप माँ होने को आत्मा का कोमार्य बता रही हैं ...आपका इस तरह लिखना केवल चमत्कृत करने की शातिराना चाल है ,आप इस चाल में बहुत हद तक सफल हो रही हैं परन्तु आपकी इस निर्लज्जता पर एक भीड़ का वाह वाह करना दुर्भाग्य पूर्ण है ! यहां गौरतलब है कि शुरू में मैंने जिन गुरु घंटालों का ज़िक्र किया उन जैसे अदब के दुश्मनों ने इस तरह के अर्थ विहीन लेखन पर ऐसी कई लेखिकाओं को कई सम्मानित पुरस्कार भी दिलवा चुके हैं !
इसी स्वयम्भू कवयित्री के समूह की एक और आदरणीया की एक फूहड़ रचना हिंदी जगत नामक पोर्टल ने ट्वीटर पर पोस्ट की, दुःख को लेकर रची गयी रचना इतनी निम्न स्तरीय अश्लील पंक्तियों से सुसज्जित थी कि वह पंक्तियाँ यहाँ लिखना भी मुनासिब नहीं और विडम्बना ये कि इन पंक्तियों पर भी धडा-धड लाइक री-ट्वीट बरस गये ! कुछ लोगों ने इस रचना की मजम्मत शुरू की , किसी ने वीभत्स लिखा , किसी ने अश्लीलता की पराकाष्ठा बताया अंत में हिंदी जगत पोर्टल की सोयी आत्मा जागी और उन्होंने इस रचना को डीलीट कर दिया ! इस घटना के बाद साहित्य के दीमकों के समूह की इन बॉक्स चर्चाएँ हुई , गैंग के अधिकतर सदस्यों ने सवाल पूछने वालों , घटिया रचना-कर्म पर तब्सिरा करने वालों को ब्लॉक करना शुरू किया जो आजतक बदस्तूर जारी है !
साहित्य की फसलों को बर्बाद करने वाले इस टिड्डी दल में रोज़ ब रोज़ इज़ाफ़ा हो रहा है ,ये लोग एक दूसरे को अपनी अलग अलग आईडी से प्रमोट करते रहते हैं इनकी इस तरह की पंक्तियां इसी प्रमोशन अभियान के तहत कालजयी रचना बना दी जाती है
जैसे :---
"मृत्यु वह प्रेयसी है
जो प्रसव की घटना के बाद बिछड़ जाती है""
इस दल की एक सदस्या ईश्वर के साथ बैठकर सिगरेट पीने का लिखती है और इनके मुरीद इन्हें चने के झाड़ पर चढ़ा देते हैं इन पंक्तियों पर ।
कविता एक नाज़ुक अमल है, अपने अहसास को कागज़ पर उतारने की कला है और ये लोग जानबूझ के ऐसे शब्दों को बेहयाई के साथ इस्तेमाल करते है कि लोग चोंक जाए ।इन सब पर सवाल करने वाले इस गिरोह की आंख में खटकने लगते हैं और ये साहित्यिक टिड्डियाँ सही टिप्पणी करने वालों पर एक साथ आक्रमण कर देती हैं ।
उल्टे -सीधे क़ाफिये, उस पर ग़लत रदीफ़
कह दी सच्ची बात तो, शायर को तकलीफ़
साहित्य में आलोचना –समालोचना की इस तरह ह्त्या क्या वाजिब है ?
विडम्बना ये है कि लेखकों से ज़ियादा ये असहिष्णुता लेखिकाओं में अधिक बढ़ती जा रही है , इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि फेसबुक ,ट्वीटर पर कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ रहे झूटी तारीफ करने वालो की दाद के बाद इन लेखिकाओं को सच्ची तनक़ीद गाली की तरह लगती है ,जैसे ही कोई इन्हें आईना दिखाता है ये भड़क जाती हैं ।
तपने से परहेज़ है, बस छपने का चाव
जो दर्पण दिखलाय है, उस पर खावे ताव
इन कवयित्रियों से मेरी कोई निजी खुन्नस नहीं है मगर जिस तरह आत्म-मुग्धता और शोहरत की चाह में ये कवयित्रियां कविता का जो नुक्सान कर रही हैं वो वास्तव में चिंता का विषय है !
किसी के ब्लॉक करने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता पर सवाल ये है कि वाह- वाही ना करने वाले क्या गुनहगार हैं ? कविता पे विमर्श करना क्या अपराध हैं ?
सोशल मिडिया पर अपना तथाकथित साम्राज्य चलाने वाली ये लेखिकाएं स्वयं को सुभद्रा कुमारी चौहान से भी ऊपर समझने लगी हैं एक आध तो ओशो की तरह महिला ओशो बन गयी हैं और ओशो के मौलिक विचारों को तोड़ मरोड़ कर अपने नाम से अपनी वर्चुल दीवार पर लगाती हैं ,कोई एतराज जताए कि दीदी ये तो ओशो का लिखा हुआ है तो उसे तुरंत प्रभाव से ब्लॉक कर देती है । फेसबुक ट्वीटर पर इस बढ़ती हुई असहिष्णुता को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता और अब इस पर विमर्श की ज़रूरत आन पड़ी है ।
सोशल मिडिया पर गंभीरता से लेखन /पाठन करने वाले लोग भी उपस्थित हैं , जब वे ऐसे वाहियात लेखन पर सवाल उठाते हैं तो एक अभियान के तहत ये साहित्यिक दस्युओं का गिरोह उन लोगो को ब्लॉक कर देता है और नकली प्रोफाइल बनाकर उनके साथ गाली गलोच करता है ! वाकई साहित्य में ये लोग कोरोना वायरस से भी जियादा खतरनाक हैं कोरोना का संक्रमण दस –पन्द्रह दिनों में ठीक हो जाता है मगर ऐसे एक दूजे की पीठ खुजाऊ लोग जो संक्रमण साहित्य जगत में फैला रहे हैं और इससे साहित्य को जो खसारा हो रहा है इसकी भरपाई सदियों तक हो पाना मुश्किल है !
आख़िर में इसी सवाल के साथ कि अदब के इस संजीदा मसअले को लेकर हम सब को मंथन करने की क्या आवश्यकता नहीं है ???


