मधुर और मूक सा मेरा प्रेम
जिसका संगीत निरन्तर मेरे अंदर बहता था
मैं बंधना चाहता था एक नदी के जैसे
जिसकी धारा निरन्तरता में बाधित न थी
मैं आज़ाद था तुम्हारे बन्धनों में भी
मधुर और मूक सा मेरा प्रेम
आज एक कोलाहल हैं मेरे ह्र्दय में
वो संगीत निरंतरता को शोर बन गया
नदी की धारा अब स्वार्थ से दूषित है तुम्हारे
जो तुम्हारे झूठे प्रेम का आवरण है
आज चीर दिया हैं उसे मेरे स्वाभिमान ने
और अब में आजाद हूँ तुम्हारे बन्धनो से
और आजाद होना हमेशा सुखद होता हैं


