सब कुछ वैसे ही चलता है

जैसे चलता था जब तुम थीं

रात भी वैसे ही बिन बुलाए आती है

दिन भी वैसे ही मुँह उठा कर आता है

तारे भी वैसे ही जगमगाते है

चाँद भी वैसे ही आंखे मलता है 

सब कुछ वैसे ही चलता है ,

जैसे चलता था जब तुम थीं

काश तुम्हारे जाने पर ,कुछ तो फर्क पड़ता जीने में

प्यास न लगती जाने पर, नाखून बढ़ना बन्द हो जाते

धड़क उठता बदन मेरा, धुँआ निकलता सीने से

पर सब कुछ वैसे ही चलता है ,जैसे चलता था जब तुम थीं

बस फर्क पड़ा है इतना सा अब घड़ी सुनिए देती है

रातो का समय अब लंबा है और नींद दुहाई देती है

ज़ेहन में उठती आवाज़ दबाने करवट बदलनी पड़ती हैं

क्षण भर की राहत को मुझको गोली निगलनी पडती हैं