चाँदनी-सी झिलमिली थी रातभर आप की खिडकी खुली थी रातभर एक तनहा बेदिली थी रातभर शम्‍म बुझ-बुझकर जली थी रातभर सिसकियाँ फिर आज बस्ती ने सुनी फिर कहीं चुनरी ढली थी रातभर आँच दामन पर न आती किस तरह ? बीच खारों के कली थी रातभर याद बनकर सेज फूलों की रही मैली चादर ओढ ली थी रातभर आँधियाँ सब कुछ उडाकर ले गयी हुस्न की खिडकी खुली थी रातभर मेहफ़िल-ए-शब के कदरदाँ जब मिले शोखियाँ मै में घुली थी रातभर रूह प्यासी थी, 'भँवर', प्यासी रही वस्ल की बातें चली थी रातभर