आज बैठकर इस बंद कमरे में,
मुझे जिंदगी का वो सुनहरा समय याद आता है,
जब हम नादान थे, बेपरवाह थे, पर तभी खुश थे,
और वो समय मेरा बचपन कहलाता है|
जब ना धूप से डर था,
ना बारिश से बैर,
ना AC की चाहत थी,
ना गाडि़यों की सैर ,
जब ना खुश होने को पैसों का रोना था,
जब मां की गोद बिस्तर और आंचल बीछौना था ,
जब पापा को घोड़ा बना पूरे घर की सैर करते थे ,
जब दोस्तों के संग चोर पुलिस खेला करते थे ,
सब कितना खूबसूरत होता था ना ,
वो माँ का प्यार पाने को मै झूठमूट का रोता था,
वो माँ से टीचर की हजार शिकायतें लगाता था ,
स्कूल ना जाने के बहाने बनाता था ,
इस बात पर पापा की बहुत डांट खाता था,
और माँ पापा के झगड़े का कारण बन जाता था ,
वो बिन बात मै जिद कर बैठता था ,
चाँद की मांग पर माँ से रूठता था ,
वो परियों की कहानियों को भी सच मानता था ,
मेरी नींद की जरूरतों में माँ की लोरी और पालना था,
वो गंदे कपड़ों में भी खुद को समझना नवाब ,
वो भोले, नटखट, पर जरूर देना जवाब ,
आज बड़े होकर सब बहुत याद आता है ,
बचपन का भोलापन मुझे फिर से बुलाता है ,
और ये बंद कमरे का अकेलापन मुझे बहुत सताता है|
- प्रियंका चौधरी
