गली के मोड से लेकर मुहल्ले के चौराहों तक जो हँसते खेलते बीता वो बचपन लौट आया है
कई बरसों मे आकर खोली जो लकडी की अलमारी मेरे बचपन का वो इतवार वापस लौट आया है
वो गुल्लक, फिरकियाँ, कुछ खोटे सिक्के, नाव कागज की वो गुल्ली-डँडा, कँचे, टूटा छाता लौट आया है
पुरानी डायरी के छोर से है झाँकता सा कुछ गुलाबी खत वो पैगामे मुहब्बत लौट आया है
तेरे दिल से निकाले दिल ने कर ली खुदकुशी एक दिन खुदा जाने कहाँ से फिर जिगर मे लौट आया है
फिजाएँ लौट आईं हैं, वफाएँ लौट आईं हैं बहारें लौट आईं हैं, सवेरा लौट आया है
वो बुलबुल लौट आई है, वो गाना लौट आया है वो बादल लौट आये हैं, वो सावन लौट आया है
गया था रूठकर माँ से, फिरा भूखा शहर भर मे सुबह का भूला देखो शाम को घर लौट आया है
चला था माँगने कल की मजूरी, सेठ के घर से मरा मजदूर देखो मार खाकर लौट आया है
गया था शीश पर आशीष लेकर युद्धभूमि मे, बहादुर माँ का बेटा शीश देकर लौट आया है
मिला फल मन्नतों, सजदों,जकातों और नमाजों का मेरा रूठा हुआ आशिक मेरे घर लौट आया है
हुआ रूखसत जमीं को छोडकर मेरा खुदा जो था, वो देखो छोडकर जन्नत जमीं पर लौट आया है
किसी ने एक दिन थूका, फलक की ओर रूख करके वो देखो उसका थूका उसके मुँह पर लौट आया है
शहर के हुक्मरानो को कोई जाकर खबर कर दो वही 'पागल दीवाना' फिर शहर मे लौट आया है


