राह से बे-राह आखिर हो गए,
दश्त मे भटके मुसाफिर हो गए |
एक दिन हमने भी वाइज को सुना,
और हम उस दिन से काफिर हो गए |
एक चेहरा-चाँद, उस पर दाग भी,
सादगी से हम मुतासिर हो गये |
बारहा की रंजिशों से यूँ हुआ,
जख्म खाने मे भी माहिर हो गये |
रात फिर से ख्वाब मे देखा उन्हे,
जख्म चाहत के हरे फिर हो गए |
जब्त टूटा, आँख बरबस बह चली,
गम बिना बोले ही जाहिर हो गए |
आप से तो आगही दरकार थी,
'आप' भी दिलदार आखिर हो गए
                  ------------गौरव सिंह