वो लड़का
हिज्र में भी जो वस्ल की बात किया करता था
वो लड़का जो मोहब्बत दिन रात किया करता था
ख़ुद ही अंधेरों में डूब कर करली ख़ुदख़ुशी
वो चराग़ जो अंधेरों से लड़ने की बात किया करता था
हर बात में वो उसकी बात किया करता था
हर ग़ज़ल का उसी से आग़ाज़ किया करता था
और ख़ुद ही बंध गया किनारों से आकर
वो दरिया जो तूफ़ानों पे राज किया करता था
वो अपनी हर नज़र उसकी नज़र किया करता था
देता था उसकी आँखों को ख़्वाब ख़ुद मुकम्मल भी किया करता था
लग गई ख़ुद ही उस ताबीज़ को नज़र
ज़माने की नज़र से जो उसे बचाने की बात किया करता था
बनाने को महबूब के लिए ग़ुलदस्ता
वो काँटों को फूलों से जुदा किया करता था
और सूख गया वो दरख़्त अब नफ़रत की बेलो से
किसी ज़माने में जो छाव बेमिसाल किया करता था
तोड़ने की चाँद को पुरज़ोर कोशिश किया करता था
बनाता था बाहों की दीवारे आँखों को छत किया करता था
जला दिया उन्हीं मशालों ने उसका घर
जिन्हें वो कभी चराग़-ए-दिल से रोशन किया करता था
और आँसुओ ने जला दी वो आँखें उसकी
जिनमें वो मोहब्बत के हसीन ख़्वाब बुना करता था
और टूट कर बिखर गया वो आसमान देखो
जिसमें मोहब्बत का पंछी बेख़ौफ़ उड़ा करता था
सुना है ज़हर से ही हो गई मौत उसकी
वो जो साँप काटने की दवा दिया करता था
और दोस्ती में आस्तीन में पाल लिए थे सांप कई
वो जो साँप समझ कर कभी रस्सी से डरा किया करता था

