पतन
जीवन एक दौड़ है
प्रतिस्पर्धा की जैसे हौड़ है।
हर व्यक्ति सफलता की फ़िराक में
पतन के मार्ग को चुन रहा।
असफलता के पथ पर होकर अग्रसर
अनैतिकता के आगे झुक रहा।
भूल कर अपनी मूल संस्कृति
आधुनिकता का ढोंग रच रहा।
आधुनिकता के भ्रम में पड़कर
अश्लीलता का ताना बन रहा।
मानवता को करके छिन्न-भिन्न
मानव विहीन कल्प की कल्पना कर रहा।

