"औरत"

औरत चीज नही बाजार की,

ये तो लक्ष्मी है घर संसार की,

प्यार ममता की देवी बन,

सेवा करती है जन-जन,

रिश्तों की मर्यादा में,

अर्पित करती अपना जीवन,

भेद भाव को त्याग,

मान रखती घर संसार की,

औरत चीज नही बाजार की,

भूखी नजरें इन पर उठती ,

चंडी बन दुष्टों से लड़ती,

ये शक्ति की रूप साक्षात ,

नही कभी किसी से डरती,

ये देवी है अवतार की,

औरत चीज नहीं बाजार की#