कुदरत के आगे सब मजबूर हैं

कुदरत के आगे ना चला किसी का ज़ोर है

जब जब इंसान को तकब्बुर हुआ

यह कुदरत ने तोड़ा उसका भरम है 

ना देखी जाती किसी की

ना देखा किसी का धरम है 

घमंड की तोड़े भी ये ही 

दिलों को जोड़े भी ये ही

ग़ुरूर में रहनेवाले 

इंसानों की मग़रूरी भी तोड़े ये ही

कुदरत के आगे सब मजबूर हैं

कुदरत का लिहाज़ करना ही दस्तूर है 

- fitôori