यह कविता गत वर्ष गोरखपुर मे हुए हादसे के बाद लिखी गई है । वस्तुतः वह हादसा नहीं वरन नरसंहार था । व्यव्यस्था की शिथिलता के कारण  कई गोदें सूनी हुई थी । इसके बाद भी " अगस्त मे तो बच्चे मरते ही है" जैसे संवेदनहीन बयानो ने निश्चित रूप से कवि मन को उद्वेलित किया था , ऐसे मे व्यवस्था का वह दर्द इस कविता मे उकेरने का प्रयास किया हूँ, कितना सफल हो पाया हूँ, आप निर्णय करें।   किलकारी अभी थमी नहीं और चिंगारी मे खो जाए। दो पल माँ ने गोद लिया ओर चिर नींद मे सो जाए ।। जहां ठिठोली होना था और सहसा ही सब रो जाए । जिसे पिता का कंधा बनना था, खुद कंधो पे सो जाए।। गर अब भी कोई चुप है तो सरोकार निभाने का क्या मतलब? आजादी के सत्तर वर्षों का त्योहार मनाने का क्या मतलब ? लहूलुहान पड़ा था फ़लक, कल कैसा सूरज निकला था ? कड़ी धूप भी किसे तपाये हर लोहा तो पिघला था । घायल पंछिया फरफरा रही थी, आसमान भी छिछला था । घोर उदासी की संझा मे क्या हर चेहरा ही उजला था ? चेतनशून्य  के महलों मे  गुहार लगाने का क्या मतलब । आजादी के सत्तर वर्षों का त्योहार मनाने का क्या मतलब ? माँ की ममता बेबस थी , पिता का पौरुष  कमतर था । गिरता-पड़ता , बेसुध-बेतहासा, कफन  हटाता करुण-दारुण यह मंजर  था।। एक सिसकती या मुसकाती तितलियों मे बस कुछ नोटों का अंतर था । उन रंगे सियारों से  तो जुगनू हो जाना बेहतर था । । खुद अपने ही उम्मीदों का बाज़ार लगाने का क्या मतलब ? आजादी के सत्तर वर्षों का त्योहार मनाने  का क्या मतलब। । गर अगस्त ही बस दोषी है और तेरा कोई दोष नहीं। सत्ता सुख के आगे जो सच मे तुम मदहोश नहीं । । अब भी जो निद्रा टूटी हो या  अब भी तुझमे होश नहीं । मै भी शिथिल पड़ा रहूँ क्या मुझमे भी कोई जोश नहीं । । ऑक्सिजन  तो दे न सका, अधिकार  जताने  का क्या मतलब ? आजादी के सत्तर वर्षों का त्योहार मनाने का क्या मतलब?