घनघोर घटा, गगन का गर्जन , काँपती रूह और तन का ठिठुरन , या जेठ दोपहरी का सूर्यतपन, या जिस्म चीरती पावन की सन-सन, पर ये भी क्या है बात नई ? होने  दो मुझे करना है शुरुआत नई । । वो गरज रहा और मुझे गरज है , जीर्ण अस्थि , रुग्ण काया  फिर  भी सहज है। नंगा पाँव , फटी धोती, उघरा देह, दो खाट, बिन ब्याही बेटी, उजरा गेह, कल भी तो उसे भरपेट रोटी मिला था ! ये कोई कम अचरज है । । थोड़ी चिंता, खूब चिंतन, हाथ कलेवा, मन मगन  । बिना छांव , थका पाँव, पथरीली राहें , झुकी कमर, जोड़ों का दर्द और करूँ आहें, फिर भी तो कल हंस रहा था, बिना शरम के "अट्ठास" यह अंकिचन। । पका फसल, हलाहल, मन प्रमुदित , जैसे किसी मुंडेर पर हुआ हो सूरज उदित । देर सवेर, फसलों का ढेर , दाम कम सपने चूर, घना अंधेरा दूर-दूर, आँख नम। मर गया बिना चुकाए ही , ये है इनका नया फ़ैशन । ।