
सिर्फ नारों और स्लोगनों से ही नहीं ला सकते कोई परिवर्तन
मानसिकता में कुछ कहीं कमी है आज भी
बीमार पिता को बेटी के घर रहना लगता है अजीब-सा आज भी
वौजूद अपने ही घर में रहता है लड़की का, दबा-दबा सा आज भी
हो रही हैं शिक्षित, आत्म-निर्भ्ररता से हुईं हैं मंडित, अव्वल नंबर से हुईं सुसज्जित
पर घर बसाने के लिए दहेज का इंतजाम कर रही हैं वो आज भी
फिजाओं में गूंज उठ रहीं हैं “मेरी बेटी मेरा अभिमान’ के नारों की
किंतु नित छेड़छाड़ बलात्कार का शिकार बन रही हैं वो आज भी
भले ही आधुनिकता ने बदल दिया हो घर की चारदीवारी का रंग
पर उसके पैदा होने पे मन में कुछ
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