मन पखेरू उड़ चला
डाल - डाल पे फुदक रहा
कभी इस डाल, कभी उस डाल
कभी पात-पात से खेल रहा।
आसमां की सैर करे
धरती गगन सब चूमे
बिना पैर और पर के
कैसे वो सारा जहां घूमे।
कभी बनने मन ललचाये
अगले ही पल दीवाना बन जाये
मन की बोली मन ही जाने
तप कर के ही इसको समझाये।
देखो रोक रहा लिखने को
जिसने कहा था लिखने को
शायद बहुत हुई बुराई
अब मन पखेरू रूसिया गए भाई..।
- महेश "माही"
