आज “चाँद” भरी दोपहर नज़र आया है..

मुस्कुरा मेरे तन बदन को ललचाया है..


धूप भी लग रही क्यों शीतल सी?

जाने तुमने क्या इंद्रजाल बिछाया है??


वसंत ऋतु महक रही है रेगिस्तान में..

ज़रूर हवाओं ने तेरा इतर चुराया है..


मरुथल में बहार सी छायी है..

आँखों में जाने कैसा दृश्य समाया है..


खिल रहें है फूल कँटीली झाड़ियों में..

देखो.. क्या तुम्हारा दुपट्टा लहराया है??


गाड़ी के हॉर्न में सरगम सी सुनाई पड़ रही है..

बेशक उसने, मेरा ज़िक्र कर, कुछ फ़रमाया है..


कुछ तो बदल सा गया है इस दिन में..

शायद उन होंठों पर नाम “मृदुल” सा आया है..

-मृदुल