दरवाज़े तक पहुँचेतो कुंड़ी टूटी पायी

अख़बार के कुछ सुर्ख़ पुर्ज़े, ज़मीन पर बिखरे फैले थे


हँसी को वक़्त की दीमक चट कर गयी थी शायद

हाथ घड़ी को भी बंद हुएएक सदी सी बीत चुकी थी


निकला तो दोस्तों से हाल पुछने ही था,

पर दरवाज़े पर लगा आइना देख मन विचलित हो उठा

क़दम जो बढ़ाए थे फिर अंदर की ओर हो लिए


दरवाज़ा भी अपना था और घड़ी भी

क्या हम उनसे उनका हाल पूछते,

और क्या अपना वक़्त बताते..

मृदुल