मेरा कोन है यहाँ? कोन?
कोई ना नज़र आता है..
ना पास बुलाता है..
नाहीं कोई सीने से लगता है..
मैं किस लिए जी रहा हूँ?
किसके लिए?
किसके सहारे?
किस कारण से?
कोन है जो मेरे ना होने पर
शोकाकुल होगा?
कुछ पल ही सही,
पर व्याकुल होगा?
कोन है जिसे मेरी कमी खलेगी?
कुछ देर ही सही,
क्या किसी की ज़िंदगी
मेरे बिन थमेगी?
पल भर में, मैं,
मेरी हस्ती, मारा वजूद
सब लुप्त हो जाएगा,
वक्त के अनंत अंधकार में
कही गुप्त हो जाएगा
मैं तो खैर सभी का होकर रहा था
उस धूप का,
जिसने मेरे माथे पर,
पसीना लीप दिया
उन रास्तों का,
जिन्होंने पैरों मैं
छाले पड़ने तक
रुकने ना दिया
उस सावन का
जिसने बरस कर
मेरे आंसुओं को
गीला कर दिया
उन काँटों का
जिन्होंने हर फूल की
उम्मीद को नाउम्मीद
कर दिया
उस नादिया का
जिसने मेरी नाव
कभी किनारे
ना लगने दी
उस ज़िंदगी का
जिसने मुझे
उसे जीने की
सज़ा दी
क्या है कोई?
जो मेरे जज़्बात समझ पाएगा?
क्या मेरे दर्द पर कभी?
किसिक़ो एक कतरा आँसू आएगा?
शायद नहीं.. शायद नहीं
शायद कभी नहीं...
-मृदुल

