उसकी चुप्पी, इस सीनें के घाव सभी सहलाती हैं..
नासूरों को नाखूनों से छेड़-छेड़ मुसकाती हैं..
भाव सभी फिर भर आतें हैं, सन्नाटों का ओर ना छोर
क्षण भर की खामोशी में है लगता सारा जीवन शोर..
आँखें उस्क़ी जब आँखों से बोल नहीं कुछ पाती हैं..
फिर अश्रु की धारा बन कर, हर खरोंच सुलगाती हैं..
कुछ, ऐसा हो बाँध वो टूटे, ख़्वाबों का सैलाब उठे..
लबजों के दरियाँ संग बहकर उस मन का भय आज मिटे..
बोलें खुलकर वो भी हमसे “जीवन का एहसास हो तुम..”
बोध रही थी जो बरसों से वो ही मीठी प्यास हो तुम..
-मृदुल


