चादरों की सिलवटों में,
हर बदलती करवटों में,
हर मचलती आहटों में,
रात के सूने पलों में..
भोर पंछी के सुरों में,
हर सुलझती उलझनों में,
हर अंधेरे की उदासी,
हर सिसकती आह प्यासी..
कुछ नयी सी ख़ुशबुएँ है,
कुछ नयी सी ख्वाहिशें है,
कुछ है खिलती सी फ़िज़ाएँ,
कुछ घटायें मुस्कुराये..
हाँ चमकते चाँद में भी,
हो खिली मुस्कान में भी,
हो यहाँ पर, हो वहाँ पर,
तुम कहो देखूँ कहाँ पर?
तुम उमड़ते साहिलों में,
हो गरजते बादलों में,
कुछ वो कातिल सी निगाहें,
मन को मेरे तिलमिलाए..
तुम ही तुम.. बस तुम ही तुम..
हो बसी बस तुम ही तुम..
मेरा “मैं” भी, अब है गुम..
रह गयी बस, तुम ही तुम..
तुम ही तुम.. बस तुम ही तुम
-मृदुल


