आज सुबह कुछ जल्द हो गयी शायद..
तुमने आँखों से, नींद मिटाई होगी..
मुस्कुराती कलियाँ बाल्कनी में खिल रही है देखो..
तुमने हँसती सी, ली अंगड़ाई होगी..
घास अभ भी कुछ गीली है मेरे आँगन की..
तुमने शायद कुछ यादें सूखाई होगी..
ओस की बूँदे अटक कर रह गयी, देखो तो..
तुमने कभी भीगी ज़ुल्फ़, झटकाई होगी..
महक सी रही है मेरे गार्डन की मिट्टी कुछ..
शायद अब स्टोव पर, चाय चढ़ाई होगी..
रोशनी कुछ बढ़ रही है हौले से ..
तुमने आँखों में, काजल लगाई होगी ..
दूर सूरज उठ रहा है क्षितिज पर..
तुमने मंदिर की, लौ जलाई होगी..
कल रात कई सितारों को टूटते देखा..
तुमने अपनी माँग सजाई होगी ..
कल रात बहुत धीरे से गुज़री क्यों कर?
तुमने बीती हर बात भुलाई होगी..
कल रात सुना तेरी डोली उठी थी दूर कही..
हमने अरमानों की इक अर्थी उठाई होगी ..
रात बाल्कनी में बैठा रहा जाने क्यों ..
शायद कल रात मुझे, नींद ना आई होगी..
-मृदुल


