आसमाँ था यहीं..
ये ज़मीं भी यहीं..
कर दिया क्या सितम
तुम रहे... हम नहीं..
तेरे ख़्वाबों के मोती
पिरोता रहा..
धागा कच्चा जो था,
था ना मुझको पता..
तेरी बोली की गोली ने
होली रची..
मेरे जीवन मैं कालिक का रंग
भर दिया...
बेवफ़ा कर सितम..
मुझपे हँसना ना तुम..
मौत से पहले ही..
ना मैं हो जाऊँ गुम
इस ज़माने ने मुझ को तो
ठुकरा दिया
तेरा दामन भी मेरा ना
होने सका
अब जी कर करूँ क्या..
मुझे तू बता
मेरा जीवन भी मुझको
लगे मौत सा...
-मृदुल


