कल रात 

मन देर तलक़ 

भीगा था..

भीगता है तन,

बरसात में,

सुना था..


ये शहर 

कई बरसात से,

सूखा पड़ा था,

पर छाद मेरा,

बरसता-अब्र 

हो चला था...


सेहरा ना बने

दुआ माँगी 

होगी किसिने...

मेरे घर तो,

यादों का,

बादल बसा था 


हर बूँद 

अरमानों का 

उठता धुआँ था 

टपक-टपक कर 

माज़ी को 

सुलगा रहा था 


आँसुओं का 

उनसे अजीब 

वाबस्ता था

आँखें मूँदने पर 

जाने कैसी 

निभाता वफ़ा था 


मन आसुओं से 

भीगता रहा 

रात भर,

उम्मीदों के 

सूखे से ये 

भला ये कब 

रुका था


-मृदुल