यहाँ रहते हैं सुबह- शाम, हर इक रोज़ बसर करते है,
मगर इस घर मैं हम, अपना वजूद तलाशा करते हैं
है बना ख़ून से मेरे, हर इक पत्थर इसका,
बाद इसके, दीवारों मैं, हम अपनी तस्वीर तलाशा करते हैं,
भले हर इक ईंट यहाँ, मेरे पसीने की कहानी कहती है,
मगर हम, ख़ुद ही यहाँ, ख़ुद को तलाशा करते है,
कई हाथों से हर इक रोज़ ज़िल्लत ले-ले कर,
थोड़ी सी उधार की इज़्ज़त को तलाशा करते है,
लोग शयद हमें कमज़ोर मान बैठें है
यहाँ हम रोज़, थोड़ी सी हिम्मत को तलाशा करते है,
रोज़ मिटते है दिनों-रात तेरी चाहत मैं,
उसी चाहत की इक परवाज़ तलाशा करते है।
-मृदुल

