तुम मेरे कत्ल की, गवाही भी मुझसे माँगोगे,

दे के इस दिल को सज़ा, रिहाई भी मुझसे माँगोगे,


कॉन समझाएँ तुम्हें, दिल की धड़कने तुम हो 

उम्र छोटीसी है, ये इलाहि भी मुझसे माँगोगे 


तुमने ये काग़ज़ तो बस इक दस्तखत को भेजा है

कभी सोचा ना, ये निशानी भी मुझसे माँगोगे


नोच कर रख दिया अरमान, अपने सपनो को

क़ैद थी उम्र की, पर विदाई भी मुझसे माँगोगे


तलाक़ हो तो चुका, दिल का, जो तुमने छोड़ा था 

क्या पता था के जुदाई भी मुझसे माँगोगे


कोर्ट के सफ़हहों से कब कॉन सा दिल जुड़ता है

तोड़ने वो कलम(*), सियाही भी मुझसे माँगोगे

-मृदुल


(*) मौत की सज़ा सुनाते वक़्त उस कलाम को तोड़ने की प्रथा