कल रात फिर सिगरेट जलाई थी,

दिल को भी सुलगा लिया था.. शायदसाथ में..


ऐश टपकती रही रात भर धुआँ हो,

आंसुओं को भी टपका लिया था.. शायदसाथ में..


हर कश छल्लों में तब्दील होते रहेरात भर,

दम  दम ग़म को भी उड़ा रहा था.. शायदसाथ में...


सुलगते रहे कुछ अध-बुझे से टूर्रे वो ऐश्-ट्रे में,

तेरी यादें सुलगा-बुझा रहा था.. शायदसाथ में...


इक-इक कश निचोड़ता रहा.. खींचता रहा.. रात भर,

जिस्म से रूह निचोड़ कर खिंच रहा था.. शायदसाथ में..


सिगरेट ना हुईमानो ज़िंदगी पी ली हो कल रात,

दम भी कुछ यूँही निकलता रहा.. शायदसाथ में..

-मृदुल