दोस्त...

ज़िंदगी का होना.. 

या फिर निदारद होना.. 


सिर्फ़.. 

साँसों की लय.. 

तेय नहीं करती.. 


जीना क्याऔर कैसा?

जिसमें ख़ुद ज़िंदगी..

बसर नहीं करती..


राह पुरानी.. अन्दाज़ पुराने.. 

पर धोका.. हर बार 

नया सा देती है..


क़िस्मत की..

क्या बात कहूँ.. 

हर बार जो चकमा देती है..


सिर्फ़ ग़म खा कर 

ज़िंदगी गुज़ारी..

नहीं जाती..


ख़ैर...हौसलें टूटें.. 

इतना कमज़ोर..

नहीं हुआ मैं अभी..


पर इस..

शतरंज की बिसात से.. 

जी ज़रूर उखता सा जाता है..


ना जाने क्यूँ?

कमबख़्त ये दिल.. 

क्षितिज पर ही क्यूँ आता है..


पास चालू मैं..

जितना उसके.. 

वो दूर निकलता जाता है..


ना जाने क्यूँ?

कमबख़्त ये दिल.. 

क्षितिज पर ही क्यूँ आता है..

-मृदुल