ज़िंदगी के सवालों का जवाब
तलाशते रह गए
इसके उलझते रास्तों का पड़ाव
तलाशते रह गए
बेवक़ूफ़ है शायद हम.. काश
ये समझ जाते
बिन चार कदम बढ़ाए
मंज़िल को नहीं पाते
भूल जाते है
के ज़िंदगी जीने मैं
तब मज़ा है
जब उसे जिया जाए
जाम सिर्फ़ तब जाम है
जब उसे पिया जाए
बोतल मैं बंद जाम
क्या पानी से कम है?
उसी तरह ज़िंदगी मैं
कभी ख़ुशी है तो कभी आँखें नम है
ज़िंदगी की बोतल को खोलो
दिल के पैमानों मैं जज़्बातों के जाम छल्काओ
एक बार के लिए ही सही
ज़िंदगी को अपनी गले से लगाओ
कहो उसे - के ऐ ज़िंदगी
मैं तुझे खुल के जियूँगा
तेरे हर घूँट को मैं
दिल से पियूँगा
ऐ ज़िंदगी तेरा हर
सितम मंज़ूर है
आख़िर तू है, तभी तो
जीने एहसास है सूरूर है
अब तेरे दिए हर ग़म को
मुस्कुरा कर भुलाऊँगा
सच ज़िंदगी,
अब मैं तुझे जी कर ही सही
तुझे लाजवाब बनाऊँगा!
-मृदुल

