चिंगरियों की बौछार करता..

फुलझड़ी सा मचलता तड़-तड़ातासा इक रिश्ता..


चमक कर आँखों को चोंधियाता..

अनार नुमा चमचमातासा इक रिश्ता..


रॉक़ेट की पूँछ से लम्बा.. इक पल में

आसमान को नीचा दिखतासा इक रिश्ता..


छोटे बड़े गोल-गोल चकोरों में घूमता-घूमाता..

ज़मीन चकरी सा नाचता-नचातासा इक रिश्ता..


बारूद भरी लड़ियों में बँधाकभी कम-तो कभी ज़्यादा..

फड़-फड़ाता साशोर मचातासा इक रिश्ता..


अनगिनत रस्सियों में लपेटाअंदर ही अंदर घुटता..

सुतली बम बन फट जातासा इक रिश्ता.. 


सुरसुरी करधुआँ और चिंगारी छोड़,

सहम कर चुप हो जाता सा इक रिश्ता..


रह रह कर कई बार गगन में रंग बिरंगी

आतिशबाज़ियों सी दिखातासा इक रिश्ता..


चिंगारी भर सेविस्फोट करबारूद उड़ता

सारी कायनात दहलतासा इक रिश्ता.. 


उस रोशनी ने हर रिश्ता पिरो लिया था मानो 

ज़िंदगी बनाता दिवालीसा हर इक रिश्ता.. 


सुलग कर बुझ गया कबना जाने.. 

प्रेम का वो दियाजिससे हर रोज़..


दिवाली मनाता था.. सुलगाता था

जलता था हर एक रिश्ता..


सुलग कर बुझ गया कबना जाने.. 

प्रेम का वो दियाजिससे हर रोज़..


दिवाली मनाता था.. सुलगाता था

जलता था हर एक रिश्ता..

-मृदुल