लिए मंद - मीठी मुस्कान..
देती सदा सब्र का ज्ञान..
ना जाने कब यूँ हुई पहचान..
उथल-पुथल से मेरे मन की अनजान..
मोहक सी वाणी बिखेर,
माया जाल शब्दों का उकेर,
लेती कैसे इम्तिहान?
चाहे अब कैसे प्रमाण?
करती प्रफुल्लित बस मुस्कुराकर..
यद्यपि मिले बिन, स्वप्न सजाकर..
खुश होता मैं तुमको पाकर..
किंतु कहाँ मिले हमें सुख सागर..
मंत्रमुग्ध सा मैं आवारा..
बिना-बात सब भेद हमारा..
मानो जैसे इक अदाकारा..
भूमिका बांध जीवन हो सँवारा..
पूरी हो अब ये पहचान..
कब तक रहें हम यूँ अज्ञान?
कैसा रिश्ता ये बेईमान..
तथापि अभी है ये बेजान..
-मृदुल

