अब वो रातों को जागमुझे पढ़ती नहीं है

वो लकीरों से टकरा अब झगड़ती नहीं है


हर वादा भुलाकर, हार मानी क्यों उसने?

बेवजह गढ़े रिवाजों से वो लड़ती नहीं है


समझती है सब फिर भीअनजान क्यों है?

वो आँखों से नींदे अब रगड़ती नहीं है


हाँ, अब वो रातों को जाग मुझे पढ़ती नहीं है


मिला ज़िंदगी क्या? यूँ हमको जुदा कर..

के हर्फ़ों से साँस अब वो, पिघलती नहीं है


मिला क्या सुकूँ मेरी बातें भुलाकर?

मुझे सोच वो तकिया अब जकड़ती नहीं है


चली क्या हवा थी जो छूटा वो आलम?

अब बाँहों में आकर सिकुड़ती नहीं है


हाँ, अब वो रातों को जाग मुझे पढ़ती नहीं है


दिया क्या था धोखाक्या मैंने रुलाया?

वो कंधा पकड़ अब संभलती नहीं है


मिटा दूँ मैं ख़्वाबों को कैसे नज़र से?

ख़यालों में  वो, अब अकड़ती नहीं है


भुला दूँमैं कैसेवो तेरी छुवन को ?

के अब तेरी ख्वाहिशें मचलती नहीं है


लिखूँ क्या? मैं किस पर? के है किसको फ़ुरसत  

के दुनिया है ज़ालिम बदलती नहीं है


वो साँसों की लेय क्यों बिछड़ती नहीं है?

हाँ, अब वो रातों को जाग मुझे पढ़ती नहीं है


-मृदुल