कारवाँ इस क़दर, कुछ मेरी मुहब्बत का चला,
लोग जुड़ते रहे दिनों-रात, कभी वो ना मिला
खुदा जाने सरे राह कहाँ खोया कमसिन
फिर तेरी बज़्म पहुँचा दे, वो रस्ता ना मिला
पुकारता रहा मैं देर तलक, ठहरे कोई
क़ाफ़िला था जो बीते वक़त का, रुकने से रहा
साँस थी चल रही, धड़कनों में रवानी भी थी
क्या पता, ज़िन्दगी से क्यों कर, वो मरासिम ना रहा
-मृदुल
