ना पटाखों का मनभावन शोर...

ना दीप की ज्योत उजाली है..

मिष्टान्नों के भंडारों में..

फीकी सी दिवाली है..

परदेस मेंमेरे  दिल सुन..

तेरी हर रात काली है..


ना ईद की मीठी सेवैयाँ..

ना होली पर भांग निराली है..

ना बैसाखी के रंग कहीं..

ना माता शेरा वाली है..

परदेस मेंमेरे  दिल सुन..

तेरी हर रात काली है..


ना माँ की ममता..

ना दोस्तों की गाली है..

ना वो बारिश की टिप-टीप बूँदें..

ना गरम चाय कि प्याली है..

परदेस मेंमेरे  दिल सुन..

तेरी हर रात काली है..


अकेला हूँ चलता

दिनों दिन सफ़र पर

ना राह में फूल 

ना काँटों भरी डाली है..

परदेस मेंमेरे  दिल सुन..

तेरी हर रात काली है..

-मृदुल