उन्हें अब मेरी शायरी से जलन होती है

कौन बतलाए नज़्म उनको ही पिरोती है


हर एक हर्फ़ उनका ही बायाँ करते हैं

जब आग़ोश में वो लखते-जिगर रोती है


शब्द को जोड़ कर, लिहाफ़ जो बुना मैंने 

हर इक तार में वो ही तो रवॉं होती है 


क्या मेल, मेरे लबज़ों का उनके आगे

रानकें-महफ़िल वो, जो ख़ुदहि ग़ज़ल होती है


ख़फ़ा हुएँ है वो, हाले-दिल लिखा हमने

करें क्या जो क़लम ख़ून में ढुबोदी है..

-मृदुल