कहूँ तुमसे क्या इस दफ़ा चाहता हूँ,
वफ़ा की जगह अब, वफ़ा चाहता हूँ..
बहुत खाली ठोकर, ज़माने के हाथों,
बस दिल में तुम्हारे, जगह चाहता हूँ..
फ़रमाइशें तो तत्पर हमेशा रहेंगी,
फ़ना हों ये सारी जफ़ा चाहता हूँ..
बहुत घाटे खाए है दिल को लगाकर,
हो थोड़ा सही, बस नफ़ा चाहता हूँ..
हो पूरी अधूरी सी ये गुफ़्तगू अब,
के मिट जाए बीतें “निशाँ” चाहता हूँ..
-मृदुल

