अचरज रहा उस लम्स के,
ता-उम्र रवाँ होने पर
जलता रहा-बुझता रहा कभी,
बाद तेरे खोने पर
बे-खोफ फिरता रहा क़तरा वो,
बन करके लहुँ
मेरे होंठों ने चुराया था उँगलियों से किसी रोज़,
सुई पिरोने पर
तड़पता था तेरी यादों में,
शायद ये रक़ीब
धड़कता रहा सीने में कई रोज़,
जुदा होने पर
फूल खिलता है, बे-मोसम भी,
तेरी मूष्क लिए
दफ़न जिस मिट्टी हुआ दिल,
ये फ़ना होने पर
-मृदुल


