क्यों कर उठती है मन मैं चाह..
क्यों कर रवाँ इस दिल मैं आह!
क्यों कर लगता है सब अपना..
क्यों कर बनता है इक सपना..
जब हर चाहत का एक मुक़ाम..
जब हर सपने का इक अंजाम..
वक़्त की धूप पड़ते ही,
इन सब पर लग जाता विराम..
सपने हो जाते है धुंदले,
अपनों का मिटता नाम-निशान..
क्यों कर उठती है मन मैं चाह?
क्यों कर लगता है सब अपना?
इश्क़ दिल मैं क्यों बसता है?
क्यों दिन रैन तरसता है?
अखियों से भी बरसता है..
कैसी है ये सूबह शाम?
क्यों प्यार का क़त्ले आम?
जब हर दिल का है एक मुक़ाम..
दिलबर की बाहों को थाम..
चलते रहना सूबह शाम..
फिर तन्हाई क्यों है आम?
क्यों कर उठती है मन मैं चाह?
क्यों कर लगता है सब अपना?
क्यों कर बनता है इक सपना?
-मृदुल


