मुखौटा ले, सजी दुनिया,

है चेहरे को, बना रखा.. 


ना भावों को, करें ज़ाहिर,

है होंठों को, दबा रखा..


ना कहती है, कभी दुनिया, 

के दिल में, भेद क्या रखा..


नज़र आती, तुम्हें हस्ती,

ज़हर दिल में, बसा रखा..


के आँखें है, बड़ी झूठी,

सही मंजर, छुपा रखा.. 


जो चलते है, कदम दो संग..

फ़रिश्ता सा, बता रखा..


कई क़िस्से, कहानी है..

कहाँ हर कुछ, सुना रखा..


बड़ी सीधी, रही हर चाल..

सभी पे मात, खा रखा..


किसी के काम, आने ने, 

हमें बदनाम, सा रखा..


लगे जो दाग, गहरे है..

खरोंचों में, है क्या रखा..


ये कोमल दिल, बड़ा नाज़ुक..

है गुल्लक सा, बचा रखा..


तेरी यादें, हुई कल कि..

के अब इनमें, है क्या रखा..


तेरी आवाज़.. ना आए..

भले फ़ोटो, लगा रखा..


ना बातें हम, से वो करतीं..

जिगर ख़ामोश, सा रखा..


के रूह को, फिर बटोरा है..

ज्यों बालु को, उठा रखा..


जो पा भी ली, जो ये दुनिया,

तो बस है ख़ाक.. पा रखा..


-मृदुल