हर कली में शबनम की मिठास होती है,
हर भँवरे के तन-मन में प्यास होती है,
नदियों की कल-कल को साहिल भी मिलता है,
किनारों से टकरा कर, समंदर भी खिलता है,
चंदा का तारों से भी साथ गहरा है,
फिर, मेरे विचारों पर, क्यों सकत पहरा है??
ये दिल हमेशा, क्यों मुझको रुलाता है?
क्या जाने कमबख़्त हरदम, क्षितिज पे ही क्यों आता है?
पास चलूँ जितना उसके, वो दूर निकलता जाता है,
क्या जाने कमबख़्त हतदम,क्षितिज पे ही क्यों आता है,
-मृदुल


